ज़ंजीर

बसंत बापटबसंत बापट

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जहाँ जाता हूँ

वहीं ये ज़ंजीर साथ जाती हैं।

क्षितिज की परिधियों में

घूमता हूँ भ्रमित,

कैशोर बालाओं ने छेड़े हैं

पंचम के स्वर,

उनका मुक्त हास्य

संगीत की मधुर तान,

मन होता है

उन्हीं में मिलकर नाचूँ गाऊँ

लेकिन लोकापवाद का भय

रोक-रोक लेता है;

जाता हूँ जहाँ

वहीं ज़ंजीर साथ जाती है।

गीली धूप पर

बरसती है सावन की फुहार,

चमेली के कुंज में

बिछी है मोतियों की झालर,

मन होता है

जंगली फूलों की तरह

मैं भी भीगूँ नहाऊँ,

लेकिन वस्त्रों की क्रीज़ बिगड़ने का भय

रोक-रोक देता है;

जहाँ-जहाँ जाता हूँ

ज़ंजीर साथ जाती है।

कभी लगता है

हाथ में लेकर तेरा हाथ

चंदन को चाँदनी में घूमें हम दोनों,

और समुद्र की गोद में

हौले से प्रवेश करें,

तभी स्वयं की प्रतिष्ठा का बाँध

रोक-रोक देता है

जहाँ-जहाँ जाता हूँ

ज़ंजीर साथ जाती है।

तितलियों के पीछे

भागते बनता नहीं,

उठती लहरों पर नाव छोड़ना

जमता नहीं,

जंगल के पक्षियों को

आकर्षित कैसे करूँ?

तीस की उमर-क़ैद ने

पैरों में पहना दी बेड़ी;

जहाँ-जहाँ जाता हूँ

ज़ंजीर साथ जाती है।

बसंत बापट
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बसंत बापट

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