पूछो वह

बसंत बापटबसंत बापट

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चढ़ाव पर झुकी डालें

मोड़ पर टूटा पुल,

वहीं चुभा काँटा

वही रौंदा गया फूल

पूछो उस बूढ़े वटवृक्ष से।

थोड़े आगे, लताएँ उलझ गईं,

थोड़े आगे, वृक्ष झुक आए,

वहीं धन्य हुई धरती

वहीं कृतार्थ हुआ नील मेघ

पूछो उस उन्मुक्त निर्झर से।

खंडहर बना पुराना क़िला

गिरी हुई दीवारें,

वहीं उगा नन्हा पीपल

वहीं कुचले गए अनेक फूल,

पूछो उस खंडित तट से।

जहाँ दिशाओं के नाम मिट गए हैं

जहाँ आकाश का उज्ज्वल भाल है,

वहीं सितारा डूबा था

वहीं रक्तिम चाँद उगा था,

पूछो उस उदास नभ से।

जहाँ आलिंगन में दृष्टि डूब गई

तुम्हारा-मेरा : दोनों का अस्तित्व-बोध मिट गया;

वहीं क्षण-भर को जिए थे

वहीं मिली थी जीवन की सार्थकता;

पूछो इस निष्प्राण मन से।

बसंत बापट
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बसंत बापट

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