उस झाड़ी के पास अभी भी
हम पर हँसते फूल सदाबहार के,
अरे अभी भी अपने स्मृतियों से
जुही झुकी जाती लज्जा के भार से।
उसी रूप में हमें देखने
काँप रहे हैं अभी तुहिन कण,
अपनी गुप-चुप बातें सुनने
झुक आता है चंपा का तन।
तेरी पृष्ठ आकृति देखकर
विस्मित है हरियाली अब तक,
तेरे कोमल चरण चूमने
उत्सुक हैं पल्लव भी अब तक।
उन बालों की उस ख़ुशबू से
बेला अब तक महक रहा है,
अरे अभी भी नीले जल में
बिंब हमारा झलक रहा है।
मेरी आशा तरलायित है
अब भी फीके चंदा नीचे,
ज़हर घोल कर इन गीतों में
हवा बह रही आँखें मींचे।








