सचाई

बालमणि अम्माबालमणि अम्मा19 Jul 1909 – 29 Sept 2004

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“हमेशा मीठा बोलने वाली मेरी माँ

क्यों करती है नफ़रत मेरे दोस्तों से?

मेरे सीने से लग कर सोए हुए मेरे

लाड़ले मुन्ने ने फिर से पूछा मुझसे।

फूल से भी कोमल बिस्तर

चाँदनी में तैरती हवाएँ

मेरे बेटे की यादों में चमका होगा

सूरज की ललाभ किरणों के नर्तन वाला आँगन

बड़े फाटक पर नुकीली जालियों को

दिखाने वाली वसंत की मुस्कराहट

दौड़ते खेलते ऊधम मचाते दोस्त—

पत्तों से छाई झोंपड़ियों से आने वाले—

मेघवर्ण, कृशतन, बिना चप्पलों वाले—

लाल मिट्टी से सने पाँवों वाले—

किसी भी शरारत में भाग लेने वाले—

फालतू दर्द को भी सहने वाले

“साँझ हो गई, चलो अब जाओ,” डपटा मैंने,

बुझे मन से मेरे चेहरे को ताकने वाले।

कुछ न बोली मैं, चुपचाप पड़ी रही

मुन्ने ने देख ली क्या मेरे मन की कुरूपता?

कैसे सच बोलूँ इस बच्चे से?

कैसे समझाऊँ मैं उसे?

हमेशा उनसे दूरी कायम रखने वाली मैं

भूल गई कि वे भी बच्चे हैं,

माटी की कुटिया में पैदा होने वालों को

अपने साफ़-सुथरे घर में कैसे आने दूँ,

हमेशा भूखे रहने वालों के साथ

अपने लाल को कैसे खिलाऊँ?

काश ऐसा होता कि उनकी इस बड़ी भूल को

देखने की समझ मुझमें न होती।

बालमणि अम्मा
About the poet

बालमणि अम्मा

मलयालम की समादृत कवयित्री-लेखिका-अनुवादक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : नालापत बालमणि अम्मा जन्म : 19/07/1909 | पुन्नायुर्कुलम, केरला निधन : 29/09/2004 | कोचीन, केरला

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