रात के अंतिम पहर में जब मैं उठी तो
माँ तू नीले वस्त्रों में लिपटी ऊँघ रही थी
तो मैंने तुम्हारे वक्ष के आर्द्रमाधुर्य को चूसा।
मोहालस्य निमिषों के सौंदर्य को समझा मैंने
शांति गंध से भरे उच्छ्वासों को महसूस किया मैंने
लहरों से लहराते सागर को याद किया मैंने
हर एक क्रिया में देखा मैंने मानव का मेहनत भरा संसार
केवल सत्याबोध में परमानंद को पाया मैंने।
तू जग कर मुझ पर नई मुस्कान बरसाती है, तो
मैं बीते हुए दिनों की ओर भागती हूँ
मेज़ पर रखे बरतन चमकते हैं धूप से
आँगन में बिखरे पड़े हैं खिलौने अनेक।








