रात बीतने को आई, उठकर देखा मैंने सामने
चाँदनी से ढका हुआ धरती का अद्भुत रूप
अब भी गूँजती है मेरे मन में
इसकी कोमल चाल की मनोहर ताल
विश्वशक्ति की लहरें फेन बिखराती हैं चारों ओर
क्षितिज के अंतिम छोर तक नील अंतरिक्ष चमका
माया क्षण पिघलते हैं बार-बार
इस अपारता में शांति का श्वासोच्छ्वास...
हे धरती तू नित्य प्रलय समुद्र में
असंख्य प्राणियों से भरी एक छोटी-सी नाव है
जब तू मेरे चरणों के नीचे होती है तो
क्या आँधी क्या तूफ़ान सभी तो
दृश्यमात्र हैं, वस्तुतः यही निमिष मेरी सिद्धि है।








