दूर, बहुत दूर अस्पताल में
स्वच्छ श्वेत शय्या पर पड़ी तू बेटी,
अपने विचारों के गहरे धागों से
आधी रात को बुनती है क्या दिन के उजाले में?
तू दुखी मत हो, भागमभाग से थक जाते हैं तो
सृष्टि के देवता देते हैं हमें विश्रान्ति का मंच-रोग
ऐसे ही थकावट को हटा पाते हैं नव उन्मेष
भविष्य की न जाने कितनी सीढ़ियाँ हैं लाँघने को।
यहाँ ओस से भीगे आँगन में बैठी तेरी
कविताएँ पढ़ती हूँ तो शंका होती है।
किसे दर्द हुआ? मुझसे अंकुरित तेरे तन को?
या जीवन खिलाने वाले तेरे मन को?
तेरी कला ने बनाया है रेशम का आवरण
जिगर के फूल को कुतरने वाले कीटाणु के सोने को
यहाँ मेरे आगे खिलकर उठती हैं, भर जाती हैं
मन के आकाश में चमकती पाँखें।
सैकड़ों शोक भावनाओं से व्याकुल यह शिराचक्र
घर गृहस्थी के कामों से थका यह शरीर
लेकिन बदल जाएगा यह तितली में
इसी बात का है मुझे भरोसा पूरी तरह।








