“थोड़ा-सा आराम कर लो,” खुरदरे पलंग पर
फैलते हुए बीमारी ने पुकारा।
बीमारी से कमज़ोर शरीर के लिए
बिस्तर पर पड़े रहने से ज़्यादा क्या सुख?
प्रतिस्पर्द्धा के खेल में थके पाँव
बिना थकावट के बढ़े आशा की ओर,
अपने लगाए फले-फूलों वृक्षों को याद कर
आँगन में रुकना मत
या उस बरामदे में जहाँ पंचेन्द्रियों से बने
भविष्य के खिलौने बिखरे पड़े हैं...
एकांत शांति में धूसर हवाओं से
अप्रभावित घी-बाती जलती है जिस कोठरी में
सच्चिदानंद का आस्वादन ले लो,
निश्चल निर्व्यग्र लेट लो थोड़ी देर को
उपयुक्त भोजन से देखभाल न की गई तो
रोग से तन और मन बिगड़ जाएगा।








