डाली की तरह झुक जाती है साँझ,
जामुनों-जैसे पकते हैं बादल,
हवा में ठंडक भरकर होती है सख़्त
और दुनिया हो आती है अलसाई-सी
समूचे आसमान में समाई हुई स्मृतियों के समूह
झाड़ियों में पैठते हैं स्तर पर स्तर :
गीला अंधकार :
आँसुओं के जुगनू बुझाता चमकाता हुआ आता है।
ऐसे क्षणों में,
दूर का दिया, लहरों पर बहकर आता है पास,
तारों को छेड़ता हुआ,
उदास स्वर झंकृत करता हुआ
घूमता है पवन,
आँखों में जम जाते हैं आँसू
मालूम नहीं किसलिए?
और मन की निःश्वासों को
नहीं मिलती कोई राह
कहीं भी।








