वह एक याद

बा. भ. बोरकरबा. भ. बोरकर30 Nov 1910 – 8 Jul 1984

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तेज़ ऊँची लहरें तट की रेत पर फेंकती हैं सफ़ेद झाग,

न दुःख, न पछतावा, महज़ वो एक याद ही काफ़ी है।

ऐसी ही बेहोशी के क्षण में, साँस में ख़ुशबू-भरी,

भीनी हवा बहती थी,

टीले के पास,

वट-वृक्ष के पीछे से, उग रहा था दूज का चाँद।

सामने का जल शांत था, तुम्हारा आँचल भी अचंचल था,

मन में वासंती यादों के घरौंदे बनते थे, मिटते थे।

अंतर में गूँजता था गीत, होंठों पर छलका था अमृत,

तुम्हें पास खींच के थोड़ा-सा,

कहा मैंने ‘गा दो न गीत प्रिये’

उभre उरोज सँभाल, घबरा के तुम हट गई एक ओर,

रूठ गई : और मुझे भी रूठता देख, ठहर गई मोड़ पर।

कभी देखती आसपास, कभी नज़र सितारों पर

शायद होंठों पर उतार रही थी मेरी धुँधली परछाई।

फिर कोहरा छा गया घना-घना

धुलकर बह गई चाँदनी,

अपने सौंदर्य के साथ, तुम कब चली गई,

मुझको मालूम नहीं।

आज भी उस क्षण की सुगंध फैलती है,

चाँज भी जल में झाँकता है,

न दुःख, न पछतावा,

महज़ वो एक याद ही काफ़ी है।

बा. भ. बोरकर
About the poet

बा. भ. बोरकर

मराठी और कोंकणी के सुप्रसिद्ध कवि-कादंबरीकार। पद्मश्री से सम्मानित। मूल नाम : बाळकृष्ण भगवंत बोरकर जन्म : 30/11/1910 | गोवा निधन : 08/07/1984 | पुणे, महाराष्ट्र

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