शिष्टाचार

बा. भ. बोरकरबा. भ. बोरकर30 Nov 1910 – 8 Jul 1984

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रहने दो दर्पण मुझको तो

अपना पनघट ही है भाता

बिंबित जिसमें सूर्य बिंब-सा

मेरा भाल-तिलक दिख जाता।

वेणी का शृंगार करो मत

देख रहा पथ प्रीतम मेरा

लंबी मृदुल उँगलियों से निज

वह बाँधेगा कंतुल मेरा।

लेकर टटके फूल रंगीले

सोन सुरंगी, लाल अबोली

गूँथेगा मेरी वेणी में

पुष्पों का प्रेमी वनमाली।

व्यर्थ मुझे चंदन कस्तूरी

सुखद तरल प्रिय आलिंगन-पल

प्रीतम के मृदु मधुर अधर में

खिले गुलाबों का शीतल जल

साज और शृंगार हटा ले

कल ही तो मैं आलि, नहाई

पुष्पित देह फूल से ताज़ा

यह ऋतु-काल बने फलदायी।

बा. भ. बोरकर
About the poet

बा. भ. बोरकर

मराठी और कोंकणी के सुप्रसिद्ध कवि-कादंबरीकार। पद्मश्री से सम्मानित। मूल नाम : बाळकृष्ण भगवंत बोरकर जन्म : 30/11/1910 | गोवा निधन : 08/07/1984 | पुणे, महाराष्ट्र

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