हम तमाम

भालचंद्र नेमाड़ेभालचंद्र नेमाड़े27 May 1938

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बेंच पर कहीं चूतड़ भर जगह मिल जाए तो हम तमाम

सब कुछ सीधा गाड़ी सीधी पटरी सीधी

हमने लाइब्ररी में पढ़ा सबकुछ सीधा-सीधा

पंक्तियाँ कितनी सीधी एक के नीचे एक

पन्ने कितने सीधे एक के पीछे एक

राजमार्ग का यातायात भी कतार में

थूकने के लिए ज़रा-सी जगह मिल जाए तो हम तमाम।

छाई है गंदगी मगज़ पर उतरेगी अब मगज़ ही में

पर सड़क पर इतनी लड़कियाँ कसक

देखते हैं सब लेकिन हाथ कोई नहीं लगाता।

दबाकर दीयों के बटन शाम को

विज्ञापनों की तड़क-भड़क चाहे जारी रहे रात भर

लेकिन दीये रात में चाहिए ही। यानी

होता है सूरज दिन भर उससे किसी का नहीं कोई वास्ता।

दीयों की माला रात के सीने पर बस फबती है। सुंदर।

अब दो चैनल गुज़रते ही हम तमाम।

भालचंद्र नेमाड़े
About the poet

भालचंद्र नेमाड़े

मराठी के समादृत कवि-लेखक और समालोचक। भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित। मूल नाम : भालचंद्र वनाजी नेमाडे जन्म : 27/05/1938 | काजगाँव, महाराष्ट्र

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