शहर में महामारी है
शहर की तमाम गलियाँ रविवार में
तब्दील हो चुकी है
किसी गली में शनिवार के जूते हैं
किसी में सोमवार के कटे हुए पैर
किसी में मुकुट, पगड़ी, नक़ाब तो किसी में
अधकटी मूँछ, चंदन-टीका,
बड़ी-बड़ी दाढ़ी
तो किसी में कटे हुए हाथों के जुलूस
गर सिक्के हैं तो कटोरी कहीं नहीं
कटोरियाँ मिले भी तो कहाँ से लाऊँ कटे हुए हाथ?
जबकि कुछ हाथों को किसी ने किराए पर
गोद ले रक्खा है
कुछ हाथों के गले में रस्सी बाँध
वे पालतू कुत्ते की तरह पुचकारते हैं इन्हें
ये तालियाँ पीटेंगे, शंख बजाएँगे, दीप जलाएँगे
काश इन्हें पता होता
कि 'पालतू होने' से बड़ी प्राकृतिक आपदा
और कुछ भी नहीं
काश इन्हें पता होता कि पालतू होते ही
तुम उस भूकंप या समुद्री तूफ़ान के
वफ़ादार सेनापति हो जाते हो
जो तुम्हारी डाइनिंग टेबल से होकर गुज़रता है
अंततः किसी दिन रविवार बीत जाता है
महामारियाँ घुटने टेक देती हैं
चिड़ियों के गीत पहले से अधिक सुरीले
सुबह का सूरज पहले से अधिक लाल
लेकिन एकतरफ़ा तूफ़ान के बाद
अलग-अलग टापू पर कुछ बचे-खुचे मासूम व
लाचार गर्दनों की फ़ौज
दूसरी ओर चाँदनी रात की छाती पर
चील-कौए बन मँडराते
कटे हुए हाथों में असंख्य कटार
कुछ निरीह आँखें बुदबुदाती है :
''गो टू हेल ईश्वर-अल्लाह''
पालतू कुत्ते एक साथ मिलकर दहाड़ते हैं :
जय जय, जय रविवार!








