वर-विवेक

Ayodhya Prasad UpadhyayAyodhya Prasad Upadhyay15 Apr 1865

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वर-विवेक कर दान सकल-अविवेक निवारे।
दूर करे अविनार सुचारु विचार प्रचारे।
सहज-सुतति को बितर कुमति-कालिमा नसावे।
करे कुरुचि को विफल सुरुचि को सफल बनावे।
भावुक-मन-सुभवन में रहे प्रतिभा-प्रभा पसारती।
भव-अनुपम-भावों से भरित भारत-भूतल-भारती।1।

प्यारी न्यारी प्रभु-पद-रता कान्त चिन्ता उपेता।
पाई जावे परम-मधुरा मानवी-प्रीति पूता।
सद्भावों से विलस सरसे सारभूता दिखावे।
होवे सारे रुचिर रस से सिक्त साहित्य सत्ता।2।

कुफल 'फूल' कदापि न दे सकें।
फल भले फल कामुक को मिलें।
विफलता विफला बनती रहे।
सफलता कृति को सफला करे।3।

नयन हों हित अंजन से अंजे।
विनय हो मन मधय विराजती।
रत रहें जन-रंजन में सदा।
रुचि रहे जगतीतल रंजिनी।4।

मधुरिमा-मय हो बचनावली।
बहु मनोहर भाव समूह हों।
हृदय में बिलसे हितकारिता।
भरित मानवता मन में रहे।5।

Ayodhya Prasad Upadhyay
About the poet

Ayodhya Prasad Upadhyay

Ayodhya Singh Upadhyay ‘Hari Oudh', (15 April 1865 – 16 March 1947) was a writer of Hindi literature. He has been the Chairman of the Hindi Sahitya Sammelan and had been conferred the title of Vidyavachaspati.

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