इतनी वाचालता का क्या करूँ कि

यशस्वी पाठकयशस्वी पाठक

1 min read · 12.4K reads

इतनी वाचालता का क्या करूँ कि

आ जाए स्वयं को प्रायोजित करना

महामहिमों, धुरंधरों, श्री और जी के बीच

स्थापित करना स्थापितों-प्रतिष्ठितों के बीच

इतनी औसरवादिता का क्या करूँ कि

लोटे की ढंगलियाहट और मेरी खिसियाहट में

भेद न हो जीव और निर्जीव का

भेद न हो हाड़-मांस, ताँबा-पीतल

धातु और पाषाण का

इतनी स्वार्थपरकता का क्या करूँ कि

घर से निकलूँ शहर की रेल पकड़ने तो

चौखट पर धरे

जल-अक्षत-पुष्प भरे

कलसे को देख

भरे न गला, रुँधे न गला

इतनी परिपक्वता का क्या करूँ कि

संबंधों की चरमराहट

टूटने-बिखने की आहट

उधड़े की सजावट और बनावट से

फटे न कलेजा, तन-मन गले न अकेला

ऐसी व्यवहार-कुशलता का क्या करूँ कि

प्रोफ़ेसर के कप में जमी चाय की मलाई भी

सूट, बेल्ट और टाई भी

लगे शोध का विषय

और विश्वविद्यालय के छज्जों में

उल्टे लटकते चमगादड़ों पर आ जाए रश्क

इतनी निर्भीकता का क्या करूँ कि

चुगते खेत परिंद को

ढेला मार उड़ा दूँ

सोते बच्चे को जगा दूँ

धुआँ कर दूँ कुनबा मधुमक्खी का

दुखे न दिल, दिल दुखाने से किसी का

इतनी मनुष्यता का क्या करूँ कि

पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति, सफलता

उदारवादिता, तार्किकता, आधुनिकता

परिवार, सगे-संबंधी और मित्रता

पीर-ओ-मुर्शिद, शाह-ओ-गदा

जिधर जाए नज़र दिखे सबमें घुन

करूँ क्या विवशता?

क्या करूँ विकलता?

यशस्वी पाठक
About the poet

यशस्वी पाठक

नई पीढ़ी की कवि-लेखक।

View profile & all 10 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगाये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा— मुनव्वर रानाचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजआंबेडकर“तुम्हारे दीन मुखों को देखकरकरुणा भरे स्वरों को सुनकर— बी. गोपाल रेड्डीमेरा और मेरी पृथ्वी का(लंबी कविता के कुछ अंश)वैसा ही हूँ, दुख मेरी गोद का बच्चा, बार-बार— हीरेन भट्टाचार्यतालाब-1मैं क्षिति तल परतुम्हारे सुख-दुख का— ब्रजरतन जोशी