कुछ पौराणिक कथाओं में वर्णित है
कि धरती शेषनाग के फन पर टिकी है
पर जब मैं देखता हूँ मज़दूर साथियों के
फ़ौलादी कंधे पर रखा फावड़ा
पीठ पर दुधमुहाँ बच्चा बाँधे
ईंट ढोंती औरतें
एक हाथ से
कमर पर पानी का घड़ा टिकाए
दूसरे से सर पर लकड़ी का गठ्ठर धरे
जंगल से लौटती लड़कियाँ
मुझे महसूस होता है
धरती शेषनाग के फन पर नहीं
इन मेहनतकश लोगों के
पीठ, सर और कंधे पर टिकी हुई है।








