और
एक रोज़
हम दोनों मिले
तुमने मुझे
सावित्रीबाई फुले की
एक सुंदर पेंटिंग भेंट की
मैंने तुम्हें
'ग़ुलामगिरी' की एक प्रति
हमारी बात
'शूद्रों की खोज' से शुरू हुई
और चलते-चलते
हमने 'जाति का विनाश' किया
कितना सुंदर होता न
अगर सच में ऐसे ही
जाति का विनाश हो जाता।








