शब्दों के बीच
अनगिनत संवेदनाएँ तड़प रही हैं
वर्ण और मात्राओं की डंडियों ने
भावनाओं की गर्दन कसकर
अपनी मुट्ठी में भींच रखा है
मैं कई बार सोचता हूँ
संवेदनाओं को छुड़ा सकूँ
शब्दों की मज़बूत पकड़ से
और लिखूँ एक मज़दूर
आदिवासी की ठेठ बोली में कविताएँ
और उन्हें बता सकूँ कि
तुम सिर्फ़
रोज़ी-रोटी का जुगाड़ नहीं कर रहे हो
लिख रहे एक साथ ढेर सारी कविताएँ
जिसमें मैं शब्दों का लेप लगाकर
जीतता आ रहा हूँ
हर साल भाषा के प्रतिष्ठित कवि का पुरस्कार।
हर रोज़
मैं सोचता हूँ
ये पंक्ति आख़िरी है
ये कविता आख़िरी है
अब मैं लिखूँगा कविताएँ
मज़दूरों की ठेठ बोली में
क्योंकि किसी चीज़ पर
पहला हक़ उसे गढ़ने वालों का है
पर मैं ऐसा क्यों
नहीं कर रहा हूँ?
मैं भी शायद उनके पढ़ने से डर रहा हूँ
पर क्यों?








