कहाँ है उनका ठिकाना? त्रिपुरा, असम, बंगाल,
संताल परगना, दक्षिण भारत, मेघालय में
घर कहाँ है? पहाड़, जंगल, चाय बगान, कोयला-खान में,
चलते हैं काम के बोझ से दोहरे होकर, आधा पेट खाते हैं, बिना इलाज मरते हैं
या फिर भाग्य के ज़ोर से बचे रहते हैं
कहाँ है उनका सम्मान? देश के रहते कोई देश नहीं,
रास्ते का कोई ठिकाना नहीं
जबकि भारत उन्हीं का है
रक्त-मांस से उन्होंने ही गढ़ा है
यह महादेश
शताब्दियों के श्रम से, पूरे लगन से, मानवीय
मंगल—की सोच से।








