इंतज़ार कितना
प्रेमिल होता है
यह हर शाम बाबा के इंतज़ार में
चौखट पर बैठी
मैंने अपनी माँ की
आँखों में देखा है।
जब कभी लगने लगता है
प्रेम कुछ नहीं होता
माँ की वही प्रतीक्षारत आँखें
सोचते हुए
मैं प्रेम की ओर लौटता हूँ।
इंतज़ार कितना
प्रेमिल होता है
यह हर शाम बाबा के इंतज़ार में
चौखट पर बैठी
मैंने अपनी माँ की
आँखों में देखा है।
जब कभी लगने लगता है
प्रेम कुछ नहीं होता
माँ की वही प्रतीक्षारत आँखें
सोचते हुए
मैं प्रेम की ओर लौटता हूँ।

नई पीढ़ी के कवि-लेखक। मूल नाम : आशीष यादव जन्म : 09/10/1998 | ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
View profile & all 30 Poems / Stories