लौटना

अजंता देवअजंता देव31 Oct 1958

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पुराने दिनों में लौटने की तरह आसान नहीं

पुराने घरों में लौटना

मुश्किल भरा होता है वह क्षण

जब दरवाज़े के पीछे से आती है अजनबी आवाज़

यह तो वह पुकार नहीं जिसे अब तक

हर रात याद किया था

सोचते हैं हड़बड़ाकर

जबकि दरवाज़ा अब भी वही है

ज़ंग लगे साँकल के साथ

बाहर हरियाली बदल चुकी है

मगर पीपल अब भी वही है

उसके तने पर अब भी चींटियाँ चढ़ रही हैं

क़तारबद्ध

चींटियों का घर नहीं बदला

पर हमारे बदल चुके हैं कई बार

घर, शहर, दोस्त और रोज़गार

गिलहरियाँ अचरज से

ठिठक कर देखती हैं पैर

और दूर भाग जाती हैं

पाँव के निशान मिटाती हुई।

अजंता देव
About the poet

अजंता देव

सुपरिचित कवयित्री। कविताओं में उपस्थित संगीतात्मक वैभव के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : अजंता देव जन्म : 31/10/1958 | जोधपुर, राजस्थान अजंता देव का जन्म जोधपुर के एक प्रवासी बंगाल परिवार में हुआ। उनकी उच्च शिक्षा राजस्‍थान विश्वविद्यालय से पूरी हुई। शास्‍त्रीय संग…

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