पुराने दिनों में लौटने की तरह आसान नहीं
पुराने घरों में लौटना
मुश्किल भरा होता है वह क्षण
जब दरवाज़े के पीछे से आती है अजनबी आवाज़
यह तो वह पुकार नहीं जिसे अब तक
हर रात याद किया था
सोचते हैं हड़बड़ाकर
जबकि दरवाज़ा अब भी वही है
ज़ंग लगे साँकल के साथ
बाहर हरियाली बदल चुकी है
मगर पीपल अब भी वही है
उसके तने पर अब भी चींटियाँ चढ़ रही हैं
क़तारबद्ध
चींटियों का घर नहीं बदला
पर हमारे बदल चुके हैं कई बार
घर, शहर, दोस्त और रोज़गार
गिलहरियाँ अचरज से
ठिठक कर देखती हैं पैर
और दूर भाग जाती हैं
पाँव के निशान मिटाती हुई।








