कीड़ों के बारे में

अजंता देवअजंता देव31 Oct 1958

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बालटियों की आवाज़ और साबुन का

स्वाद पहचानते हैं

अच्छी तरह मालूम है उन्हें

आटे की गोलियों में ज़हर के बारे में

खेत में एकटक घूरते हैं पॉलीथिन की थैलियाँ

और खोदने लगते हैं और गहरा

पत्ते कुतरते हुए टपक जाते हैं

छींटों से बचकर

नाली की दीवार से चिपक कर

बहने देते हैं फ़िनायल का घोल

तरह-तरह के धुएँ में साँस रोकने की कला

पहले ही सीख चुके हैं

अब बेहोशी का अभिनय भी

कमाल का करते हैं

मैंने कितनी बार देखा है

रोशनी में भागती छिपती आबादी

छत पर जाले

दीवारों पर बिल

दीमक की बाँबियाँ

ट्यूबलाइट के ऊपर छिपकली

अपनी जैव घड़ियाँ इन्होंने मिला रखी है

हमारी दिनचर्या से

ठीक आधी रात को घर और शहर

उनके हवाले होता है

मनुष्य जब-जब जहाँ-जहाँ

आराम करते हैं

तब-तब वहाँ-वहाँ ये काम करते हैं

इस तरह शताब्दियों से

हम एक साथ घर-बार कर रहे हैं

छोटी-मोटी दुश्मनियाँ पाल कर

इन्हें जल्दी नहीं है

ये जानते हैं

यह पृथ्वी पहले भी उनकी थी

यह पृथ्वी उनकी है बाद में भी

अजंता देव
About the poet

अजंता देव

सुपरिचित कवयित्री। कविताओं में उपस्थित संगीतात्मक वैभव के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : अजंता देव जन्म : 31/10/1958 | जोधपुर, राजस्थान अजंता देव का जन्म जोधपुर के एक प्रवासी बंगाल परिवार में हुआ। उनकी उच्च शिक्षा राजस्‍थान विश्वविद्यालय से पूरी हुई। शास्‍त्रीय संग…

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