उनके चले जाने पर

योगेंद्र गौतमयोगेंद्र गौतम

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एक धीमी धुन के बाद दो जगहों के बीच जैसे खिंच चुका है परदा,

दोनों जगहें दो अलग दुनियाएँ हो चुकी हैं।

दर्शक अभी भी बैठे हैं सभागार में जबकि कलाकार जा चुके हैं।

शब्द सो गए हैं मौन समाधि लेकर

आँख से अब-तब टपक पड़ती बूँदों से साँस लेकर बीच-बीच में उभरती हैं सिसकियाँ...

चेहरों के रंग दीवारों के रंग होकर उतर चुके हैं।

जाते हुओं को देने के लिए

कुछ नहीं था हमारे पास―'विदा' के दो अक्षर भी नहीं...

वे जाते रहे दृश्य में से घट कर और हम बैठे रहे निःशब्द... किंकर्त्तव्यविमूढ़...

हमारी देह नहीं हिली किसी अभिव्यक्ति में

हम बैठे रहे दोनों हाथ बाँधकर।

हमारी आत्मा किसी गहरे शून्य में रीत चुकी।

जाने वाले यूँ अदृश्य हुए जैसे मध्यरात्रि को खुली आँख के बाद का स्वप्न घुल जाता है धीरे-धीरे रात के झुटपुटे में।

जीवन के मरुस्थल में स्मृतियों के शिलालेख अब रह-रहकर चमकते हैं।

योगेंद्र गौतम
About the poet

योगेंद्र गौतम

नई पीढ़ी कवि-लेखक और अनुवादक।

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