सुबह का गीत

योगेंद्र गौतमयोगेंद्र गौतम

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रात भर ओस में डूबी डाली पर बैठकर चिड़िया कुछ कहकर गई है।

सूर्य के ललाट से उठती किरणें धरती का तन छूती हैं और उगते फागन की केसरी रंगत गेहूँ की हरित बालियों में घुल जाती है।

रात का उनींदा चंद्रमा धुँधले आकाश के शामियाने के कोने से लटकता दूसरी ओर बस गिरने ही को है।

एक सद्य-प्रसूत माता के स्तन ढूँढ़ता है।

उसकी मुँदी-खुली हथेलियों के कोमल आघात से माता की स्वप्न-कलिका चटकती है और उसके चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है।

बछड़े के गले मे बँधी घंटी उसके रँभाने की ताल पर बजती है, और यह ध्वनि सकल जगत में फैल जाती है।

मैं, उनींदा, सारी रात जागकर लिखता हूँ सवेरे का गीत

और तुम्हारा मुख चूम लेता हूँ इस सुबह कविता में सूर्य के उगने से पहले।

योगेंद्र गौतम
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योगेंद्र गौतम

नई पीढ़ी कवि-लेखक और अनुवादक।

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