इस रात्रि में

योगेंद्र गौतमयोगेंद्र गौतम

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तुम्हें हाँक लगाकर

मैं वापस बैठ गया।

मुझे विश्वास था कि

तुम अभी आ जाओगी

और अपनी हथेली मेरी हथेली में दे दोगी

मेरी पथराई देह पर अभी खिलता होगा तुम्हारा मंदिर स्पर्श!

इस बुझते समय में और क्या चाहिए था अधिक मुझको

एक तुम्हारे सामीप्य की चाह

फिर चाहे तो टूट जाए श्वासों की माला;

दृष्टि उठा, नयन भर देख तो सकूँ तुम्हें

बस इतनी दे दे ईश्वर नेत्रों को ज्योति और ज्योति को जल।

जाने कितनी अनगिन रात्रियों को जागकर काटते हुए

पृथ्वी की प्रतीक्षा भर चुकी है देह में।

हँसिये के आकार का यह गलता हुआ चंद्रमा

और जलते हुए नक्षत्र

मुँह चिढ़ाते हैं मुझ अनिद्र को

फिर भी जाने क्या

आस-सी जगती है इस मेघाच्छन्न निर्गंध रात्रि में;

सब सो जाते हैं, मैं जागता हूँ।

ऐसे अपरूप समय में मेरी आहट सुन

बोलो, क्या खटकती है तुम्हारे द्वार की साँकल?

योगेंद्र गौतम
About the poet

योगेंद्र गौतम

नई पीढ़ी कवि-लेखक और अनुवादक।

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