मैं कभी समुद्र तक नहीं गया
न ही समुद्र कभी मुझ तक आया
पर एक शांत समझ थी
जिससे मुझे लगता था कि मेरा कोई संबंध रहा है इससे
शायद ऐसा ही समुद्र को भी लगता रहा हो
रात का सन्नाटा हमें जोड़ता था,
चढ़ते-उतरते चाँद सूरजों की दूरी
हमारी दूरी थी,
दोनों के भीतर गहरे शोर की भाषा हमारी भाषा थी!








