अभी

योगेंद्र गौतमयोगेंद्र गौतम

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अभी बरसकर इकट्ठा हुए पानी के चहबच्चों में

उन स्मृतियों के बिंब थे

जिन्हें अब तक

जिया नहीं गया था।

इस रात्रि पानी की स्मृति में

एक ऐसी यात्रा बैठ गई थी जिसे शेष था

अभी किया जाना।

पृथ्वी पर खिलकर बिखरे फूल—

जो पानी पर तैर रहे थे,

अभी तक मन के उद्यान में खिले ही थे।

अभी हृदय धड़कना था

पानी पर गिरते पत्ते की ध्वनि पर।

उनसे होकर बीतती हवा

किसी अज्ञात किनारे खड़े हम तक अभी बहनी थी।

अभी हमें देखना था

बंद आँखों से उस पार खड़े अपना चेहरा

जो ताकता था कहीं गहरे शून्य में।

अभी ठहरा था निर्वात में,

अचेतनता में पुकारा हुआ कोई शब्द,

अभी वह शब्द तुम्हारा नाम होना था।

योगेंद्र गौतम
About the poet

योगेंद्र गौतम

नई पीढ़ी कवि-लेखक और अनुवादक।

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