नहीं रहा आलमपनाह का हुज़ूर दरबार
और वहाँ मौजूद तख़्त-ए-ताऊस में जड़े बसरा दोआब के मोती
दीन-ए-इलाही भी समय की ओट हुआ
भूल गई दुनिया बादशाहत और रंगमहल की परदादारी
मगर इतिहास में आज भी गूँजती वह रागिनी
किसी कलंदर, फ़क़ीर की दुआ की तरह
तानसेन का निराला संगीत जवाब माँगता है हमसे
स्वामी हरिदास की कृपा को याद रखे
या करीम परवरदिगार को भूल जाए
यह एक बात इतिहास को मायने देती है
कि अकबर को याद करना
दरअसल तानसेन, रहीम के बहाने
संगीत और कविता को याद करना है
दमक उठती आज भी कविता में
उन महफ़िलों में सदा रौशन रहने वाली
नौरोज़ की शमा, जब उसे मालूम पड़ता
उस्तादों के रियाज़ की नज़ीरें
नहीं मानती फ़र्क़ की सजदे में सिर
किधर किस दिशा में झुकता है
कि दिल से निकली आवाज़ में
हिंदू-मुस्लिम का मतलब अलग-अलग होता है
और अज़ादारी हो या महफ़िलों की रंगदारी
सभी में होने वाली रागदारी का मिज़ाज
एक कलाकार ही तय करता है
इतिहास के सुनहरे हर्फ़ों में मौजूद
भाषा और सुर की तमीज़ को परखते हुए
तानसेन को याद करना सुकून देता है
यह जानते हुए कि बादशाहों के महलों से दूर भी
एक सल्तनत हुआ करती है
एक साम्राज्य का ख़ज़ाना बिखरा रहता है
जहाँ कोई अकबर सादे लिबास में जाता है
और एक दीवानी मीरा की आवाज़ के सदक़े में
चुपचाप अपना सिर नवाता है।








