आराम से पढ़ूँगी तुम्हें

यशस्वी पाठकयशस्वी पाठक

1 min read · 12.4K reads

आराम से पढ़ूँगी तुम्हें

कहीं कोई रुआँ बाक़ी न रहेगा

आहिस्ता चखूँगी तुम्हारे होंठों पर रखी बात

मिलते हुए भवों के बिरड़ जंगलों में भटकूँगी

मुझसे पूछते हो,

मैं तुमसे आँखें मिलाने से कतराती क्यों हूँ?

तुम्हारे इस सवाल का क्या जवाब दूँ तुम्हें?

तुम चाहते हो : मैं तुम्हें पढ़ती जाऊँ

तुम्हारी किताबों के पाठक की तरह नहीं

बल्कि उस तरह जैसे दिल से देखने वाले पढ़ते हैं ब्रेल लिपि

तुम्हारे माथे के शफ्फ़ाफ़ गगन में झूमते काले बादल

जब नाद-निनाद से थकते हैं

तब कनपटी पर नुमूदार होती हैं पसीने की नन्ही बूँदें

इन्हें अपनी उँगलियों की सतह पर महसूस करना

मुझे ज़िंदगी से भर देता है

तुम्हारी हथेलियाँ रबर की पत्तियाँ हैं

जिनमें उगी लाल धारियों की धुन

कान लगा सुनने को जी चाहता है

तुम्हें अपनी ओर आते देखना या

किसी स्टेशन पर मेरे इंतिज़ार में खड़े हुए पाना

मेरी धड़कनों की रफ़्तार बढ़ा देता है

तुम्हारा वजूद मेरी दुनिया के सुंदर होने की गवाही है

तुम लफ़्ज़ों के ख़ुदा हो

मैं तुम पर ईमान लाने वाली वाहिद लड़की

मुझ पर फ़र्ज़ है कि मैं तुम्हें हिफ़्ज़ कर लूँ।

यशस्वी पाठक
About the poet

यशस्वी पाठक

नई पीढ़ी की कवि-लेखक।

View profile & all 10 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like