चेतन-निश्चेतन को तरंगित कर रही छठी इंद्री
बिधने की कोई सीमा नहीं
बेधने के अधिकार से अधिक है कोई अधिकार क्या?
प्यासा हरियल खोजता तालाब आकाश में!
ताल पर तबले की तलवे क्षत हैं
हैं मगर आनंद के मद में चूर
सर्द साँसों की सुइयाँ सिलती हैं कलेजा
सालता है सुख कैसे जानता है वह अकेला
गुण-औगुण सब उसके लेखे
वह जो याचक है, करता नहीं जो याचना
सौंपकर स्वत्व मुझको करता नित आत्म-रचना
जानता है वह—पराजय, जय है, जय ही पराजय
रुग्ण, विक्षिप्त, सिहरता, चिहुँकता
मन मेरा कोमल, करुण
करे न स्वीकार जय अपनी
अस्वीकृत है उसकी पराजय।








