कुछ भी वैसा नहीं

उमा शंकर चौधरीउमा शंकर चौधरी

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अब जब तक तुम लौटकर आओगे

कुछ भी वैसा नहीं रहेगा

न यह सुनहरी सुबह और न ही यह गोधूलि शाम

न यह फूलों का चटक रंग

न चिड़ियों की यह क़तार

और न ही यह पत्तों की सरसराहट

अब जब तक तुम लौटकर आओगे

रात का अँधेरा और काला हो चुका रहेगा

बारिश की बूँदें और छोटी हो चुकी होंगी

हमारे फेफेड़े में जगह लगभग ख़त्म हो चुकी रहेगी

जब तुम गए थे तब हमने सोचा था

कि अगली सर्दी ख़त्म हो चुका होगा हमारा बुरा वक़्त

राहत में होंगी हरदम तेज़ चलने वाली हमारी साँसें

लेकिन अगली क्या उसकी अगली और उसकी अगली सर्दी भी चली गई

और ठीक सेमल के पेड़ की तरह बढ़ता ही चला गया हमारा दुख

अबकि जब तुम आओगे तो

तुम्हें और उदास दिखेंगे यहाँ हवा, फूल, मिट्टी, सूरज

और सबसे अधिक बच्चे

अबकि जब तुम आओगे तो चाँद पर और गहरा दिखेगा धब्बा

मैं जानता हूँ कि तुम आओगे देखोगे इन उदास मौसमों को

और तुम जान लोगे हमारे उदास होने का ठीक ठीक कारण।

उमा शंकर चौधरी
About the poet

उमा शंकर चौधरी

इस सदी में सामने आए हिंदी कवि-कथाकार। भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन और साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित। जन्म : 01/03/1978 | खगड़िया, बिहार उमा शंकर चौधरी का जन्म 1 मार्च 1978 को खगड़िया, बिहार में हुआ। वह इस सदी में सामने आए हिंदी कवि-कथाकार हैं। उनके…

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