साक्षात्कार देने आए प्रत्याशियों की पंक्ति में
उस मुसलमान लड़के से पूछ रहा है बग़ल का प्रत्याशी
कल हुए विस्फोट का सच
बम रखने वाले आतंकवादियों की संख्या
उसका चेहरा, और उसका तरीक़ा
उससे पूछा जा रहा है कि
बम विस्फोट करने से ऐन पहले उन आतंकवादियों ने
किस होटल में खाया था गोश्त और चावल
उस मुसलमान प्रत्याशी से पूछा जा रहा है
उसकी क़मीज़, उसके जूते की क़ीमत
और साथ में यह भी कि
उसे ज़रूरत ही क्या है इस नौकरी की?
पैसों के लिए उसे नौकरी करने की क्या ज़रूरत है
समाज के इस माने हुए सच को
उसे फिर सुनाया जा रहा है
उसकी तार को बिना कहे ही यहाँ और वहाँ से
जोड़ा जा रहा है
वह मुसलमान प्रत्याशी
जो डरा हुआ था उस साक्षात्कार से
अब डर रहा है अपने वजूद से
वह डर रहा है अपने होने से
वह डर रहा है अपने जीवन से और मुसलमान शब्द से
मुझे डर है कि
कहीं कुछ दिनों, कुछ महीनों, कुछ वर्षों में
इस दुनिया के सारे इतिहासों और शब्दकोशों में से
मुसलमान शब्द को उड़ाकर उसकी जगह पर
आतंकवादी न लिख दिया जाए
आज से सैकड़ों वर्ष बाद जब
सारे बच्चे पूछेंगे इस आतंकवादी का अर्थ
तब उसको बताया जाएगा कि एक समय था
जब इस धरती को किसी की नज़र लग गई थी
एक पूरी क़ौम ने
इसे काले साए की तरह घेर लिया था
एक पूरी क़ौम जिसका बच्चा-बच्चा
बम फोड़ना जानता था
उस मुसलमान प्रत्याशी के पिता मारे जा चुके हैं
उस मुसलमान प्रत्याशी की चार बहनें शादी के इंतज़ार में
जवानी पार कर चुकी हैं
और उसकी माँ के पान खाए मुँह में कैंसर है
उस मुसलमान लड़के की बहनें बूढ़ी हो रही हैं
उस मुसलमान लड़के की माँ मर रही है
वह मुसलमान लड़का घर में बंद है
चुपचाप, शांत, निरीह।








