अरावली के आख़िरी दिन
एक मधुमक्खी परागकणों के साथ
उड़ते-उड़ते थक जाएगी।
सभी बहेलिए जाल को देखकर
उलझन में पड़ जाएँगे।
एक नन्हा ख़रगोश लू की बौछार में
हाँफते-हाँफते थक जाएगा।
चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे
इस निरीह-निर्वसन धरती पर।
अरावली के आख़िरी दिन
युवतियाँ छाता लेकर सैर करने जाएँगी
और लॉन में टहलकर लौट आएँगी।
एक शराबी चंद्रमा की रोशनी में
बहेलिए बस्तियों की ओर लौटते नज़र आएँगे।
कुछ पीले चेहरे सब्ज़ियों के ठेले लेकर
मुहल्लों में रेंगते हुए आवाज़ें देंगे।
बिना तारों वाली सघन अँधेरी रात में
रावण-हत्थे की आवाज़ के साथ तैरेगी
बच रह गए एक गीदड़ की टीस।
और जिन्हें नीले नभ में बिजलियाँ चमकने,
बादल गरजने और वर्षा की बूँदों का इंतिज़ार है,
सूखे काले अँधेरे में आँख मिचमिचाते और
कानों में कनिष्ठिकाएँ हिलाते थक जाएँगे।
और जिन्हें किताबें पढ़ने का शौक होगा,
शब्दकोश में साँप का अर्थ ढूँढ़कर
अपने बच्चों को कालबेलिया जोगियों की कथा सुनाएँगे
और सुनहरे केंचुल ओढ़े कोई देवता
सितारों की ओट में धरती को भरी आँख से निर्निमेष निहारेगा।
हालाँकि बात ऐसी है
अरावली की कोई एक तस्वीर देखकर
सूरज और चाँद के नीचे सुन नहीं पाता कोई
कभी ख़त्म न होने वाली बिलख, जो हर
इमारत की नींव तले दबी फूटती रहती है।
बड़ी आलीशान इमारतों में खिलते रहते हैं
ख़ूबसूरत गुलाबों जैसे नन्हे शिशु
और इसीलिए किसी को विश्वास नहीं होता कि
अरावली के आख़िरी दिन अरावली ऐसी होगी?
अरावली के आख़िरी दिन ऐसा ज़रूर होगा
एक अवतारी पुरुष आएँगे
एक नबी पुकारेगा
लेकिन बात ऐसी है कि वे दोनों आईफ़ोन पर व्यस्त होंगे
उन्हें न धनिए, न हरी मिर्च, न मेथी, न आलू,
न टमाटर, न ज़ीरे और न हरे चने की ज़रूरत होगी,
क्योंकि उनके बैग में
मैक्डॉनल्ड के बर्गर, मैकपफ़ और सालसा रैप होंगे।
अरावली का इसके अलावा यहाँ और क्या अंत होगा?
अरावली का इसके अलावा वहाँ और क्या अंत होगा?








