मेरे गाँव में

हुकुम ठाकुरहुकुम ठाकुर

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मेरे गाँव में

हाथ भर लंबा बादलों का घूँघट काढ़े

सुकेत की ओर से आती

झुनझुनी आँधियों के पीछे

आता है वसंत चुपके-चुपके

पता नहीं क्यों

मैंने इन आँधियों में हमेशा ही

रेगिस्तानों का ठहराव देखा है

आते ही वह मेरे घर में

एक ऐसा कोना ढूँढ़ता है

जहाँ हवा बेरोकटोक आती-जाती हो

अपनी थकान को अलगनी पर टाँग कर

हाथ-मुँह धोकर

वह सुस्ताते हुए कहता है—

बत्ती मत जलाना

बड़ा कठिन समय है।

बाहर आँगन के कोने में पड़ी दोपहरी

कुछ एक बरन सूत वाले

कुछ दो बरन सूत वाले

कुछ गोल कुछ चौकोर रिश्ते

अपने अलग-अलग क्षेत्रफलों के साथ

प्रवेशद्वार पर फूलमाला लिए

इस नए-नए बसंत के स्वागत को

खड़े हैं मुस्तैद

उधर आँगन के दूसरे कोने में

शब्दों का जमघट लगा है

और अपने बग़लगीर से गुत्थमगुत्था हैं सभी शब्द

कि वे एक-दूसरे का नाम क्यों भूल रहे हैं

एक कत्थई शब्द कह रहा है—

कुछ शब्द पालतू क़िस्म के होते हैं

जो बात कर सकते हैं

कुछ गा सकते हैं

हँस सकते हैं

परंतु खुले आसमान में

लंबी और उन्मुक्त उड़ान नहीं भर सकते

इसलिए वे हमसे छोटे हैं

घर के पिछवाड़े बाग़ में

पलम के फूलों को टूँगता सुग्गा

धान के तूश में

चाऊल की कणी ढूँढ़ते घुग्घू को

हर बार की तरह

दो दूनी चार का पहाड़ा सुना रहा है

यह भी समझा रहा है

कि बस्ती के लोगों के पास

बहुत सारा काम कैसे जमा हो गया है

और कैसे बासी रोटी से

भूख का तिलिस्म

तोड़ने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं

मैं उस धूप को

होश में लाने की कोशिश कर रहा हूँ

जो कुछ माह पहले अगहन में

गाँव के बाहर पगडंडी पर

ठोकर लगने से बेहोश हो गई थी

मेरी समझ में

बसंत के स्वागत का

इससे अच्छा कोई और तरीक़ा नहीं हो सकता।

हुकुम ठाकुर
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