कब मेरा नशेमन अहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं

Qamar JalaviQamar Jalavi1 Jan 1887 – 4 Oct 1968

1 min read · 12.6K reads

कब मेरा नशेमन अहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं

ग़ुंचे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं

 

अब नज़्अ' का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो

जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं

 

जाती हुई मय्यत देख के भी वल्लाह तुम उठ के आ न सके

दो चार क़दम तो दुश्मन भी तकलीफ़ गवारा करते हैं

 

बे-वजह न जाने क्यूँ ज़िद है उन को शब-ए-फ़ुर्क़त वालों से

वो रात बढ़ा देने के लिए गेसू को सँवारा करते हैं

 

पोंछो न अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो

सुनते हैं कि शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं

 

कुछ हुस्न ओ इश्क़ में फ़र्क़ नहीं है भी तो फ़क़त रुस्वाई का

तुम हो कि गवारा कर न सके हम हैं कि गवारा करते हैं

 

तारों की बहारों में भी 'क़मर' तुम अफ़्सुर्दा से रहते हो

फूलों को तो देखो काँटों में हँस हँस के गुज़ारा करते हैं

Qamar Jalavi
About the poet

Qamar Jalavi

Qamar Jalavi (Urdu: قمَر جلالوی ‎), (born Muhammad Husain and also known as Ustad Qamar Jalalvi) was a renowned Pakistani poet. He was born in Jalali near Aligarh, India in 1887, and died on 4 October 1968. After the creation of Pakistan in 1947, he moved to…

View profile & all 26 Poems / Stories

More from Qamar Jalavi

  1. मिरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देना

    मिरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देनाज़बाँ से कुछ न कहना देख कर आँसू बहा देना

    12.6K reads
  2. सज्दे तिरे कहने से मैं कर लूँ भी तो क्या हो

    सज्दे तिरे कहने से मैं कर लूँ भी तो क्या होतू ऐ बुत-ए-काफ़िर न ख़ुदा है न ख़ुदा हो

    12.6K reads
  3. बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुई

    बारिश में अहद तोड़ के गर मय-कशी हुईतौबा मरी फिरेगी कहाँ भीगती हुई

    12.6K reads
  4. शैख़ आख़िर ये सुराही है कोई ख़ुम तो नहीं

    शैख़ आख़िर ये सुराही है कोई ख़ुम तो नहींऔर भी बैठे हैं महफ़िल में हमीं तुम तो नहीं

    12.6K reads
  5. तुम को हम ख़ाक-नशीनों का ख़याल आने तक

    तुम को हम ख़ाक-नशीनों का ख़याल आने तकशहर तो शहर बदल जाएँगे वीराने तक

    12.6K reads

More Poetry & Stories You May Like

मुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानातुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती हैतुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती हैख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है— मुनव्वर रानाक्या ऐसी स्त्री को जानते हैंहम प्रेम नहीं करतेयानी हमारी भावनाएँ आत्मघाती नहीं हैं— हरे प्रकाश उपाध्यायअर्थात् एक ज़रूरी काममहाकाव्यों महानायकों के दिन हवा हुएआज दिन भर बस मैं एक कुतिया का पीछा करूँगा— हेमंत शेषआग की रेत पर तैरती नदीउस लड़की के सिर परसदैव तारों से जड़ा— भूपिंदर प्रीतप्रेम के दस्तावेज़ों मेंप्रेम के दस्तावेज़ों में बाक़ी हैअभी लिखी जानी दास्ताँ उन लोगों की— धर्मेश