गरचे ऐ दिल आशिक़-ए-शैदा है तू

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानीमुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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गरचे ऐ दिल आशिक़-ए-शैदा है तू

लेकिन अपने काम में यकता है तू

आशिक़ ओ माशूक़ करता है जुदा

ऐ फ़लक ये काम भी करता है तू

लाख पर्दे गर हों तेरे हुस्न पर

कोई पर्दों में छुपा रहता है तू

हाल-ए-दिल कहने लगूँ हूँ मैं तो शोख़

मुझ से यूँ कहता है ''क्या बकता है तू''

पास बैठा उस के मैं रोया किया

यूँ न पूछा मुझ से ''क्यूँ रोता है तू''

रात दिन तू है मिरी आग़ोश में

मैं तिरा साहिल मिरा दरिया है तू

बज़्म में उस तुंद-ख़ू की दौड़ दौड़

काम क्या? क्यूँ? किस लिए जाता है तू

वाँ नहीं मुतलक़ तिरा मज़कूर भी

'मुसहफ़ी' किस बात पर भूला है तू

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
About the poet

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र…

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