आशिक़ तो मिलेंगे तुझे इंसाँ न मिलेगा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानीमुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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आशिक़ तो मिलेंगे तुझे इंसाँ न मिलेगा

मुझ सा तो कोई बंदा-ए-फ़रमाँ न मिलेगा

हूँ मुंतज़िर-ए-लुत्फ़ खड़ा कब से इधर देख

क्या मुझ को दिल ऐ तुर्रा-ए-जानाँ न मिलेगा

कहने को मुसलमाँ हैं सभी काबे में लेकिन

ढूँडोगे अगर एक मुसलमाँ न मिलेगा

नासेह इसे सीना है तो अब सी ले वगरना

फिर फ़स्ल-ए-गुल आए ये गरेबाँ न मिलेगा

रहने के लिए हम से गुनहगारों के या रब

क्या शहर-ए-अदम में कोई ज़िंदाँ न मिलेगा

होने की नहीं तेरी ख़ुशी सर्व-ख़िरामाँ

ता ख़ाक में ये बे-सर-ओ-सामाँ न मिलेगा

दिल उस से तू माँगे है अबस 'मुसहफ़ी' हर दम

क्या फ़ाएदा इसरार का नादाँ न मिलेगा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
About the poet

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र…

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