आसाँ नहीं है तन्हा दर उस का बाज़ करना

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानीमुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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आसाँ नहीं है तन्हा दर उस का बाज़ करना

लाज़िम है पासबाँ से अब हम को साज़ करना

गर हम मुशीर होते अल्लाह के तो कहते

यानी विसाल की शब या रब दराज़ करना

उस का सलाम मुझ से अब क्या है गर्दिश-ए-रौ

तिफ़्ली में मैं सिखाया जिस को नमाज़ करना

अज़-बस-कि ख़ून दिल का खाता है जोश हर दम

मुश्किल हुआ है हम को इख़्फ़ा-ए-राज़ करना

बा-यक-नियाज़ उस से क्यूँकर कोई बर आवे

आता हो सौ तरह से जिस को कि नाज़ करना

करते हैं चोट आख़िर ये आहुआन-ए-बदमस्त

आँखों से उस की ऐ दिल टुक एहतिराज़ करना

ऐ आह उस के दिल में तासीर हो तो जानूँ

है वर्ना काम कितना पत्थर गुदाज़ करना

होवेगी सुब्ह रौशन इक दम में वस्ल की शब

बंद-ए-क़बा को अपने ज़ालिम न बाज़ करना

ऐ 'मुसहफ़ी' हैं दो चीज़ अब यादगार-ए-दौराँ

उस से तू नाज़ करना मुझ से नियाज़ करना

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
About the poet

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र…

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