अक़्ल गई है सब की खोई क्या ये ख़ल्क़ दिवानी है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानीमुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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अक़्ल गई है सब की खोई क्या ये ख़ल्क़ दिवानी है

आप हलाल मैं होता हूँ इन लोगों को क़ुर्बानी है

नुत्क़-ए-ज़बाँ गर होता मुझ को पूछता मैं तक़्सीर मिरी

हाँ ये मगर दो आँखें हैं सो इन से अश्क-फ़िशानी है

घास चरी है जंगल की मैं जून में दुंबे बकरे की

उन का कुछ ढाला कि बिगाड़ा जिस पर ख़ंजर रानी है

तीन जगह से मेरे गले को मिस्ल-ए-शुतुर ये काटते हैं

दीन-ए-मोहम्मदी है जो ख़लीली उस की ये तुग़्यानी है

जिंस ने जिंस को क़त्ल किया कब देखियो बद-ज़ाती तो ज़रा

या'नी जो हो मर्द-ए-मुसलमाँ उस की ये ही निशानी है

काफ़िर दिल जल्लाद नहीं हम ज़ख़्म को एक समझते हैं

हम को जो इस काम का समझे उस की ये नादानी है

राह-ए-रज़ा पर अपना गला कटवाए जो नीचे ख़ंजर के

'मुसहफ़ी' उस को हम ये कहेंगे वो भी हुसैन-ए-सानी है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
About the poet

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र…

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