अँधेरे में वसंत

लीलाधर जगूड़ीलीलाधर जगूड़ी1 Sept 1940

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दिन की क़लम और मौसम के फूल

अँधेरा मुझे वसंत की तरह भोग रहा है

पिछले साल जहाँ दूब थी वह जगह नंगी हो गई है

मैं वहाँ उगने का शोर सुनाना चाहता हूँ

मिट्टी फोड़कर निकलने का दर्द

तमाम शाखाओं से फूटना चाहता है

नंगेपन पर झर चुकने के बाद

एक अपराधी हवा मुझसे कहती है कि हमने नहीं उगाया

यह इस साल का फैला हुआ जंगल

तुम्हारे लिए। मेरे लिए

कुछ भी नहीं उगा। कुछ भी नहीं!

लीलाधर जगूड़ी
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लीलाधर जगूड़ी

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