उस दिन का जंगल

लीलाधर जगूड़ीलीलाधर जगूड़ी1 Sept 1940

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पिछले पतझर में हम कितने रोशन थे जैसे उजाले के दो पेड़

घास बड़ी होती है तो आपस में दोस्त हो जाती है

पेड़ बड़े होते हैं तो अकेले हो जाते हैं

(अपने-आपमें उलझे हुए)

पुराने पेड़ों के सान्निध्य में चिड़ियों के घोंसले थे

पुराने पानी में नए पानी के घुसने का शोर था

आसमान थोड़े-से बादलों के पीछे पूरा छिपा हुआ था

और हम दो पेजों की तरह चिपके हुए थे

समय हमारे बीच चाक़ू की तरह नहीं घुसा था

हमारे चारों और, हज़ारों वर्ष पुराना जंगल था

देखकर जिसने महसूस किया आने वाला वसंत

दूर। उस दिन वह ऐसा जगा

हमारे लावण्य-भरे चेहरे खाकर

कि रातों-रात अपनी खाल का रंग बदलने लगा।

लीलाधर जगूड़ी
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लीलाधर जगूड़ी

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