बहे या नहीं तुम्हारी आँखों से आँसू
मैंने नहीं देखा सचमुच
इतना भर देखा अवश्य
कि आँखों की कोर अब तक
है डबडबाई आँसुओं से
लक्ष्य कर रहा तुम्हें यों ही तबसे
इच्छा नहीं कि जानूँ आँसुओं के उमड़ आने का कारण
नहीं देखना जी-भर कि फिर नहीं देख पाऊँगा तुम्हें
बाढ़ से तुम्हारे आँसू
नहीं हिम्मत कि बहा सकूँ मैं भी
मैं सिर्फ़ तलाश रहा हूँ उत्तर
उस सवाल का, जो उठता है मुझमें बार-बार :
क्या तुमने ढूँढी है सचमुच मौत पराजय में
या
हिस्सा है यह किसी नए मोर्चे की तैयारी का?








