सैनिक का शव

लनचेनबा मीतैलनचेनबा मीतै

1 min read · 12.4K reads

बहे या नहीं तुम्हारी आँखों से आँसू

मैंने नहीं देखा सचमुच

इतना भर देखा अवश्य

कि आँखों की कोर अब तक

है डबडबाई आँसुओं से

लक्ष्य कर रहा तुम्हें यों ही तबसे

इच्छा नहीं कि जानूँ आँसुओं के उमड़ आने का कारण

नहीं देखना जी-भर कि फिर नहीं देख पाऊँगा तुम्हें

बाढ़ से तुम्हारे आँसू

नहीं हिम्मत कि बहा सकूँ मैं भी

मैं सिर्फ़ तलाश रहा हूँ उत्तर

उस सवाल का, जो उठता है मुझमें बार-बार :

क्या तुमने ढूँढी है सचमुच मौत पराजय में

या

हिस्सा है यह किसी नए मोर्चे की तैयारी का?

लनचेनबा मीतै
About the poet

लनचेनबा मीतै

मणिपुरी भाषा की ‘युवा कविता धारा’ के प्रतिनिधि कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

View profile & all 20 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like