आज़ाद पंछी परवाज़ पर

लनचेनबा मीतैलनचेनबा मीतै

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प्रारंभ करते ही स्वातंत्र्य-जागरण गीत

जकड़ डाले साहस भरे फैले तुम्हारे हाथ-पाँव

मनुष्य द्वारा मनुष्य के ही दमन हेतु निर्मित

मैली-घिसी रूढ़ि की बेड़ियों में—

मल्ल-योद्धा सा कोई ग्राम्य-युवा

सूर्यावसान के निकट

कसकर बाँधता जैसे लकड़ियों का गट्ठर

हड़बड़ाते हुए

लेकिन उड़ान भर ली प्राणों ने तुम्हारे

दोनों परों को अनथक

फड़फड़ाते हुए स्वतंत्रतापूर्वक

बंधन का अवसर दिए बिना

आज़ादी को हृदय में बसाए

हज़ारों-हज़ार लोगों के

शस्य-श्यामल-विराट्

निस्सीम हृदय-खेतों में

उतरते हो तुम जब भी दाना-चुगने

भाग आते चारों ओर से

मदमत्त प्रेम के आँसू

धीरे-धीरे लघु तरंगों में

तुम खेलते हो उन्हीं में

पीढ़ी-दर-पीढ़ी

खेल-कूद, डुबकी लगा

फड़फड़ाते पंख

कभी;

नन्हें चमकीले बुलबुले

फोड़ते नुकीली चोंच से।

लनचेनबा मीतै
About the poet

लनचेनबा मीतै

मणिपुरी भाषा की ‘युवा कविता धारा’ के प्रतिनिधि कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

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