खिली मालती झड़ गिरी खिलकर
रह गई जगत में वितरित सुरभि-भर।
टूट गई वीणा, टूट गए तार
रह गई केवल शेष, अमृत-झंकार।
मिल गई पंचतत्त्व में तरुणी सुंदरी
मधुर मुस्कान केवल रह गई ठहरी।
दूज के चाँद का बीत गया जीवन
रह गई मधुरता की झीनी-सी किरण।
संध्या की धीमी हवा धीरे से बह गई
हृदय को विकलकर मृदुल हिलोर रह गई।
आकांक्षा की अधीरता हृदय का उद्वेग
वासना की अतृप्ति, आशा का कष्ट-भोग
हट गए धीरे-धीरे, प्रतिध्वनि-भर रही
सुहाग साधन चला गया कातर वेदना हाय रही।
धन गया, जन गया, गए काय-क्लेश
सुयश-कुयश रह गया, आत्मा अवशेष।








