अवशेष

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

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खिली मालती झड़ गिरी खिलकर

रह गई जगत में वितरित सुरभि-भर।

टूट गई वीणा, टूट गए तार

रह गई केवल शेष, अमृत-झंकार।

मिल गई पंचतत्त्व में तरुणी सुंदरी

मधुर मुस्कान केवल रह गई ठहरी।

दूज के चाँद का बीत गया जीवन

रह गई मधुरता की झीनी-सी किरण।

संध्या की धीमी हवा धीरे से बह गई

हृदय को विकलकर मृदुल हिलोर रह गई।

आकांक्षा की अधीरता हृदय का उद्वेग

वासना की अतृप्ति, आशा का कष्ट-भोग

हट गए धीरे-धीरे, प्रतिध्वनि-भर रही

सुहाग साधन चला गया कातर वेदना हाय रही।

धन गया, जन गया, गए काय-क्लेश

सुयश-कुयश रह गया, आत्मा अवशेष।

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

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