प्रेम

लक्ष्मण गुप्तलक्ष्मण गुप्त3 Jan 1983

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एक

तुम्हारा आकर्षण
आँखों में आबाद रहा
सूरज की सवारी करते हुए
जब सूरज थककर सो गया
रात की गोद में
आँखों का जादू जाता रहा

दो

मेरी देह पर नमक लादकर
तुमने मुझे
सूरज के आगे खड़ा कर दिया
मैं तुम्हारा गीत गाते हुए
मुस्कुराता रहा

तीन

एक रात 
अँधेरों के सामने
मेरे बदन में शामिल 
सूरज के टुकड़े को
पिघलाया
तुमने
और मैं हमेशा के लिए
शीत का पर्याय बन गया!

लक्ष्मण गुप्त
About the poet

लक्ष्मण गुप्त

नई पीढ़ी के कवि-ग़ज़लकार। निम्नमध्यवर्गीय संवेदना के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : लक्ष्मण गुप्त जन्म : 03/01/1983 | पूर्वी चंपारण, बिहार

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