धीरे-धीरे बनाम जल्दी-जल्दी

लक्ष्मण गुप्तलक्ष्मण गुप्त3 Jan 1983

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धीरे-धीरे

चढ़ती हैं आवाज़ें

क़ुतुब मीनार पर

धीरे-धीरे

चढ़ते हैं रंग

आसमान में

धीरे-धीरे

सीखता है बच्चा

चलना

धीरे-धीरे

चिड़िया पा लेती है

उड़ना

धीरे-धीरे

धरती पर होता है

जन्मना

धीरे-धीरे

मिट्टी की गोद में

समाना

बहुत कुछ

इसी तरह से

धीरे-धीरे ही घटित होता है

मगर

बहुत कुछ

इसी तरह से

धीरे-धीरे नहीं

जल्दी-जल्दी घटित होता है

जल्दी-जल्दी

बदलती हैं शक्लें

आकांक्षाएँ

जल्दी-जल्दी

बढ़ आते हैं हमारे

नाख़ून

जल्दी-जल्दी

चौराहों पर बहता है

ख़ून

जल्दी-जल्दी

दीवारें होती हैं

राख

जल्दी-जल्दी

देह हो जाती है

भाप

जल्दी-जल्दी

गिरते हैं

किरदार

जल्दी-जल्दी

शूली पर लटकता है

प्यार!

लक्ष्मण गुप्त
About the poet

लक्ष्मण गुप्त

नई पीढ़ी के कवि-ग़ज़लकार। निम्नमध्यवर्गीय संवेदना के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : लक्ष्मण गुप्त जन्म : 03/01/1983 | पूर्वी चंपारण, बिहार

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