चले गए लोग

लक्ष्मण गुप्तलक्ष्मण गुप्त3 Jan 1983

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चले गए वे लोग

अपने जीवन से थककर नहीं

हमारी बासी होती ज़िंदगी से ऊबकर

उन्हें ईर्ष्या थी ठंडेपन से

वे सिर्फ़ चीज़ों में ही नहीं चाहते थे गर्मी

संबधों में भी ताप बनाए रखना चाहते थे

वे दिन भर की गर्मी को दबोच लेते थे—

खुरदरी लकीरों वाली मुट्ठियों में

ओढ़ लेते थे फटे हुए तलवों के चारों ओर

अगली सुबह तक के लिए पर्याप्त गर्मी

वे सर्दीली रातों में आग से नहीं

इसकी-उसकी चिंताओं से गर्म होते थे

चले गए वे लोग

जो दुपहर में आए अतिथि को

रोक लेते थे यह कहकर

कि ठहर जाओ अभी रात होने वाली है

यक़ीनन वे लोग रात को आसमान से नहीं

ज़मीन से जानते थे

उन्हें पता था कि रात की चादर

हवा में नहीं बुनती

वह हमारे ज़ेहन में रच-बुन जाती है!

चले गए वे लोग

जिनके लिए घर का ख़ालीपन

जीवन में ख़ालीपन होता था

दरवाज़े का सन्नाटा होता था

आँखों में गहरे तक समा जाने वाला सूनापन

वे लोग हमेशा ही आँखों से बुझते

अंतरात्मा से कभी नहीं बुझते थे

उनकी आत्माएँ

सिर्फ़ उन्हीं में नहीं बसती थीं

वे जग के सारे चर-अचर में विराजती थीं

तभी तो वे अपने पुरखों-पुरनियों को

मरने के बाद भी

देख लेते थे

किसी फूल में

किसी सर्प में

किसी चिड़िया में

किसी पशु में

या फिर घर के आस-पास

अभी-अभी जन्मे

किसी बच्चे में…!

लक्ष्मण गुप्त
About the poet

लक्ष्मण गुप्त

नई पीढ़ी के कवि-ग़ज़लकार। निम्नमध्यवर्गीय संवेदना के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : लक्ष्मण गुप्त जन्म : 03/01/1983 | पूर्वी चंपारण, बिहार

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