मौसम है बड़ा रूखा
धधक उठा हवा में
दबा हुआ बारूद
मेरे मन का
स्याही-क़लम से निकली
निष्प्राण कविता
मेरी शस्य-श्यामला
शस्य ही है सच
मेरा और कोई
न गीत है, न कविता
हरा-हरा आँचल
तुम्हारा थालकर
राख हुए मेरे गीतों के
उस पार देखो!
झूम उठे हैं बादल
आ रहा है सावन
गीतों का मौसम
हुआ आकाश काला
जंगली भैंसे-सा
तुम्हें बखानने को हो चली
मेरी क़लम उतावली...








