मेरी शस्य-श्यामला

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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मौसम है बड़ा रूखा

धधक उठा हवा में

दबा हुआ बारूद

मेरे मन का

स्याही-क़लम से निकली

निष्प्राण कविता

मेरी शस्य-श्यामला

शस्य ही है सच

मेरा और कोई

न गीत है, न कविता

हरा-हरा आँचल

तुम्हारा थालकर

राख हुए मेरे गीतों के

उस पार देखो!

झूम उठे हैं बादल

आ रहा है सावन

गीतों का मौसम

हुआ आकाश काला

जंगली भैंसे-सा

तुम्हें बखानने को हो चली

मेरी क़लम उतावली...

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

हीरेन भट्टाचार्य

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