अप्रतिद्वंद्वी

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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मृत्यु से कौन लड़ता है, जीवन का संगीत मृत्यु की सूक्ष्मता में शुद्ध

स्वर जिस की ध्वनि की प्रकृत उद्धृति है, मेरी पीठ पर हाथ रख

एक विशाल पुरुष—कविता पुरुष;

मैं उसकी छाया के साथ स्मृति के गुच्छे बटोर कर चल रहा हूँ,

मुक्त सपनों के सामने रोशनी की घेराघेरी

मैं नहीं जानता कविता क्या है

मेरी भयावह यात्रा के साथी और कौन हैं,

या फिर अपनी सीमाबद्धता,

मैं शरीर तोड़कर निकल आता हूँ या फिर ज़िंदा ही

पूरा का पूरा ज़मीन के नीचे धँस जाता हूँ, ज़मीन के नीचे

मेरी संपूर्ण देह, मिट्टी मेरी देह के पास, आकाश-पाताल;

मेरे चारों तरफ़ मिट्टी, मिट्टी मेरी लालची जीभ में।

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

हीरेन भट्टाचार्य

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