रोपाई दृश्य पर
आंचलिक भाषा में
मांगलिक गीत गाते हुए
वे रोपती हैं
ज़िदगी की जड़ें पानी में
रंग-बिरंगी पोशाकें
माटी में सने हाथ
जैसे
पिघले सोने में सने हाथ
ज़मीन को दिन भर नमन करती कमर
शाम को चूल्हे से होते हुए
बिस्तर तक पहुँचती है जब
गीली लकड़ी की आग-सी
धुआँ-धुआँ हो जाती है
पृथ्वी की गोलाई समेटे
नथनी झूलती है
भविष्य-सा
कई जंगल हैं सीने में
मगर ढूँढ़ती है गीत
पूरी शिवालिक शृंखला का नाम है औरत
औरत पहाड़ का नाम है








